★ सिख थे सिख ही रहे, बने न मुसलमान | तेगबहादुर नाम से जाने सारा हिंदुस्तान ★

गुरु तेग बहादुर जी सिखों के नौवें गुरु थे. गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं की बहुत मदद की. उनकी धर्म की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की बिल्कुल भी चिंता नहीं की. मुगल शासक औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर जी को हिंदुओं की मदद करने और इस्लाम नहीं अपनाने के कारण उन्हें मौत की सजा सुना दी. इस्लाम अपनाने से इनकार करने की वजह से औरंगजेब के शासनकाल में उनका सर कलम कर दिया गया. गुरु जी को धर्म और आदर्शों के लिए जान दे देने वाले गुरुओं में गिना जाता है. अपने धर्म और इमान की रक्षा करते हुए उन्होंने अपनी जान तक दे दी थी. उनकी इसी शहादत के याद में 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस मनाया जाएगा। मुगल शासक औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर जी को हिंदुओं की मदद करने और इस्लाम नहीं अपनाने के वजह से उन्हें मौत की सजा सुना दी

★ गुरु तेगबहादुर जी का जन्म, बचपन :—-

1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में पैदा हुए गुरु तेग बहादुर जी का बचपन का नाम त्यागमल था. उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह था. वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे और शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई. बचपन से ही वे संत स्वरूप, गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। धर्म के सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए गुरु तेग बहादुरजी ने कई स्थानों का भ्रमण किया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। उनके जीवन का प्रथम दर्शन यही था कि धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है। शांति, क्षमा, सहनशीलता के गुणों वाले गुरु तेग बहादुरजी ने लोगों को प्रेम, एकता व भाईचारे का संदेश दिया।

★ गुरु तेगबहादुर ने सिखी युद्ध कलाएं :—–

उन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की और इसी के साथ मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया और इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया.

★ गुरु ने दिलाई गुलामी से मुक्ति :–

गुरु तेग बहादुर सिंह जहां भी गए, उनसे प्रेरित होकर लोगों ने न केवल नशे का त्याग किया, बल्कि तंबाकू की खेती भी छोड़ दी और उन्होंने देश को दुष्टों के चंगुल से छुड़ाने के लिए जनमानस में विरोध की भावना भर, कुर्बानियों के लिए तैयार किया और मुगलों के नापाक इरादों को नाकामयाब करते हुए कुर्बान हो गए. गुरु तेग बहादुर सिंह में ईश्वरीय निष्ठा के साथ समता, करुणा, प्रेम, सहानुभूति, त्याग और बलिदान जैसे मानवीय गुण विद्यमान थे और शस्त्र और शास्त्र, संघर्ष और वैराग्य, लौकिक और अलौकिक, रणनीति और आचार-नीति, राजनीति और कूटनीति, संग्रह और त्याग आदि का ऐसा संयोग मध्ययुगीन साहित्य व इतिहास में सुसज्ज्ति है.

★ गुरुजी को जब मुग़लो ने बनाया बंदी :—–

जब वे दिल्ली की ओर जा रहे थे तो रास्ते में मलिकपुर रंगड़ा गांव में सरहिंद के सूबेदार ने उन्हें बंदी बना लिया। औरंगजेब तब दिल्ली से बाहर था। चार महीने तक गुरु तेग बहादुरजी सरहिंद की जेल में रहे। जब औरंगजेब दिल्ली आ गया तो गुरुजी व उनके साथियों को दिल्ली लाया गया। इसके बाद उन पर भयंकर अत्याचार का दौर शुरू हुआ। तीन दिन तक उन्हें व उनके शिष्यों को पानी तक नहीं दिया गया। दिल्ली की कोतवाली के पास गुरुजी व उनके शिष्य लाए गए। पहले भाई मतिदास को आरे से चिरवाया गया। जब औरंगजेब का इससे भी मन नहीं भरा तो भाई दयालदास को खौलते पानी में डाला गया।

गुरू तेग बहादुर औरंगजेब के सामने नहीं झुके और अपने शिष्यों के अद्भुत बलिदान का गुणगान करते रहे। इसके बाद भाई सतीदास के बदन पर रूई लपेट कर आग लगा दी गई। गुरुजी ने उसके बलिदान को धन्य-धन्य कहा।

शिष्यों के बलिदान के बाद गुरु तेग बहादुरजी ने अपना शीश बलिदान कर दिया। दिल्ली में शीशगंज गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुरजी के उस महान बलिदान की स्मृति को आज भी ताजा कर देता है।

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