★ कोलम्बस का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां ★

कोलम्बस का जन्म इटली के समुद्रतट पर बसे नगर गेनेआ में सन् 1451 में हुआ था । उनके पिता डोमेनिको कोलम्बो पेशे से जुलाहा थे । बाद में उनका परिवार गेनेआ से सेओना शहर आ बसा । कोलम्बस को बचपन से ही समुद्री यात्राओं का बहुत शौक था । 14 वर्ष की अवस्था से ही उन्होंने समुद्री यात्राओं का जोखिम उठाना प्रारम्भ कर दिया था । उन्होंने कई समुद्री युद्ध भी जीते थे ।

विश्व के अन्यतम साहसी व्यक्तियों में से एक थे: क्रिरटोफर कोलम्बस, जिन्होंने अपने अदम्य आत्मविश्वास से मार्ग में उसने वाली अनेक कठिनाइयों एव बाधाओं का सामना किया । जीवन-भर तिरस्कार और अपमान की पीडा भोगते हुए महान् कारनामा कर दिखाया, उसके लिए वे इतिहास में अमर हो गये ।

★ कोलम्बस कक वैवाहिक जीवन ★

कोलम्बस का विवाह पुर्तगाल की फिलिपा पेरेस्टोला से सन् 1478 में हुआ । 1479 में उन्हें जो पुत्र हुआ, उसका नाम उन्होंने डीगो रखा ।

◆ कोलम्बस की समुद्री यात्रायें ◆

कोलम्बस ने न केवल अमेरिका की खोज की थी, अपितु कई समुद्री मार्गो का पता भी लगाया । उन्होंने पृथ्वी की कर्क रेखा की वास्तविक स्थिति की खोज की । कोलम्बस अपने बहनोई के द्वीप मेडिरा रहने चले गये । वहां दक्षिण अटलांटिक महासागर की कई समुद्री यात्राएं करके उन्होंने कई अनुभव प्राप्त किये । लिस्बन आकर उन्होंने मार्कोपोलो की समुद्री यात्रा का अध्ययन करने के साथ-साथ टोलेमी के नक्यो का अध्ययन कर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की ओर, अर्थात एशिया महाद्वीप की यात्रा करने की सोची थी । इस हेतु उन्होंने पुर्तगाल तथा ब्रिटेन के सम्राट से अनुमति भी मांगी, किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी । कोलम्बस ने अपनी इस योजना को स्पेन के राजा फरदीनेन्द तथा रानी ईसाबेला के सामने रखा । सन् 1486 में इस यात्रा हेतु सहमति मिली । कोलम्बस ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह ऐसे स्थान की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां सोना, चांदी तथा बहुमूल्य रत्न आदि मिलेंगे और वहां पर स्पेन का शासन भी स्थापित होगा । राजा द्वारा बनाई गयी समिति ने 4 वर्ष तक कोई निर्णय नहीं लिया । फलस्वरूप यह योजना ठण्डे बस्ते में पड़ी रही Situs Slot Gacor । निराश कोलम्बस को स्पेन के पादरी और नक्षत्र-विज्ञानी एन्टोनियो डि मारचेना तथा एक जहाज मालिक मार्टिन एलन्त्रो पिज्जॉन का सहयोग मिला ।

जहाज और धन की व्यवस्था होते ही कोलम्बस यात्रा के लिए निकल पाते, तो राजा फरदीनेन्द ने कोलम्बस से पूछा: ”खोज में जो कुछ भी मिलेगा, तो कोलम्बस उसका क्या मूल्य लेगा ?” कोलम्बस ने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा: ”सामन्त का दरजा, ग्रेण्ड एडमिरल और वायसराय की पदवी मेरे तथा मेरे परिवार के लिए दी जाये ।” राजा ने इसे नामंजूर किया । बाद में रानी ईसाबेला के कहने पर उनकी शर्ते मान लीं । कोलम्बस को धन तथा यात्रासुलभ सभी प्रकार की सुविधाएं प्रदान कर दी गयीं । 3 अगस्त, 1942 को कोलम्बस पूर्ण तैयारी के साथ छोटे से जहाज पर सवार होकर 12 अगस्त को केनेरी द्वीप समूह पहुंचे । 6 सितम्बर, 1942 को कोलम्बस तीन जहाजों (पिंटा, निना और सांतामारिया) के नेतृत्व करते हुए अपने दोनों मित्रों के साथ पश्चिम दिशा की ओर चल निकले । समुद्र की अनन्त सीमा के बीच पहुंचकर कोलम्बस अपने साहस व आत्मविश्वास के साथ 700 कि॰मी॰ दूर धरती पर पहुंचने का सकल्प लिये बढ़ चले थे । उनके साथी भयभीत थे । 3 दिन पूरा होते-होते कोलम्बस अनिश्चित रास्तों से बढ़ते हुए भी स्पेन जा पहुंचे थे । सुखद आश्चर्य से भरे हुए कोलम्बस ने स्पेन की धरती पर अपना झण्डा गाड़ दिया । एक सप्ताह तक द्वीप की सुन्दरता तथा उससे प्राप्त situs judi slot online gampang menang होने वाले सोने की आशा में वे भटकते रहे । निराश होकर वे आगे की यात्रा पर बढ़ चले । इसी बीच कोलम्बस का सहयात्री अपने पिंटा जहाज के साथ गायब हो गया था । वे आशंकाओं से भरकर उसे खोजते हुए हाइतू द्वीप पहुंचे । वहां के निवासियों से मिलकर वे बहुत प्रभावित हुए । सोने की खोज में क्यूबा पहुंचने पर उन्हें सोने की बजाय तंबाखू मिला । हाइतू द्वीप पर कोलम्बस ने एक किले का निर्माण भी करवाया था । उनका सांतामारिया जहाज भी नष्ट हो चुका था । अब वह एकमात्र जहाज निना पर सवार थे । स्पेन लौटना मुश्किल था । फिर भी वे रयेन लौटने लगे । रास्ते में उन्हें पिंटा जहाज के साथ पिजन मिला । पिंजॉन और कोलम्बस के बीच काफी कहासुनी हुई । फिर दोनों यूरोप यात्रा पर निकल पड़े । खराब मौसम, समुद्री तूफान की भयानकता अचानक बाधा बनकर सामने थी । पिंटा जहाज फिर भटक गया । कोलम्बस निना के क्षतिग्रस्त होने पर काफी घरूराये । उन्होंने इसे अपनी अन्तिम यात्रा जानकर खोज की हुई सारी जानकारियां लिखकर एक लकड़ी के डिबे में सुरक्षित जहाज पर रख दीं । इसी यात्रा के दौरान कोलम्बस ने अमेरिका की खोज भी कर डाली थी । 15 मार्च, 1493 को स्पेन पहुंचने पर राजा और रानी ने कोलम्बस को उनकी शर्त के अनुसार न केवल पदवियां दीं, बल्कि उन्हें अपार धनराशि और अगली यात्रा हेतु सहमति भी दी । वे सितम्बर 1493 को 17 पोतों पर करीब डेढ़ हजार लोगों को अपने साथ ले जाकर अमेरिका और आसपास के द्वीपों पर बसाना चाहते थे; क्योंकि वहां बहुत सोना था । पादरी, डॉक्टर, सर्जन, किसान के साथ-साथ कोलम्बस अपने साथ डीगो को भी ले गये । कोलम्बस हाइतू द्वीप पर भी जा पहुंचे थे, जहां उन्होंने एक किले का निर्माण कर 38 स्पेनवासियों को उसकी रखवाली हेतु Bonus New member 100 (slot game) छोड़ रखा था । स्थानीय लोगों ने उन 38 लोगों की हत्या कर डाली थी । कोलम्बस का यहां बहुत अपमान हुआ । अपने स्वभाव की कठोरता और गुस्से होने की वजह से वे लोगों को नाराज कर देते थे । पश्चिमी दिशा की ओर अपनी समुद्री यात्रा में वह वेस्टइण्डीज डीप जा पहुंचे थे ।

एशिया द्वीप की खोज में भटकते-भटकते वे अमेरिका के खोजकर्ता बन गये । वेरटइण्डीज से जैसे ही वह हाइतू द्वीप पहुंचे, वहां 5 महीनों तक बीमारी के साथ-साथ वह स्थानीय विद्रोह से ग्रसित रहे । विद्रोहियों को जहाजों में भरकर स्पेन भेजा गया । 10 मार्च, 1496 को कोलम्बस को स्वागत सम्मान के साथ तीसरी यात्रा की रचीकृति भी मिली ।

6 जहाजों पर 2 सौ लोगों को सवार कर वे त्रिनिदाद द्वीप समूह को खोज निकालने में सफल रहे । वहां उन्हें सोना न मिला । तीसरी यात्रा में पुन: हाइतू द्वीप पहुंचने पर कोलम्बस को भारी विद्रोह का सामना करना पड़ा । उनकी शिकायतें राज फरदीनेन्द तक भी जा पहुंची थीं ।

कोलम्बस और उनके भाइयों को सम्पत्ति, किला, हथियार भण्डार सहित सब कुछ सौंपने को कहा गया । मना करते ही कोलम्बस और उनके भाइयों को जंजीरों से जकड़कर स्पेन लाया गया । जंजीर   में  बंधे कोलम्बरा ने दुःख उघैर क्षोभ में कुछ नहीं कहा । यद्यपि कोलम्बस को मुक्त कर यात्रा की सुविधा दे दी गयी ।

किन्तु चौथी यात्रा के लिए अपने अपमान के कारण कोलम्बस पूरी तरह टूट चुके थे । राजा-रानी के विश्वसाघात के धक्के ने उन्हें बीमार कर दिया था । इसके बाद भी उन्होंने जमैका की खोज की ।
29 मई, 1506 को मृत्यु के सागर में समा गये। कोलम्बस एक साहसी परिश्रमी, दूरदर्शी, दृढ संकत्यी यात्री थे । उन्होंने अपनी समुद्री यात्रा के दौरान अपार सम्मान पाया था । जब उन्हें जंजीरों से जकड़कर रयेन लाया जा रहा था, तो लोग स्तनकी जंजीरों को खोल देना चाहते थे, किन्तु कोलम्बस ने ऐसा करने से उन्हें रोक दिया । अपने परिश्रम, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का उन्हें जो दण्ड मिला, उसने उन्हें भीतर तक हिला दिया था । ससार को सीख देने के लिए ही शायद उन्होंने अपनी जंजीरों को अपनी कब्र पर रखवाया था ।

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