भारत आने वाले 7 प्रमुख विदेशी यात्री

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय उपमहाद्वीप कई विदेशी यात्रियों के आगमन का गवाह रहा है और उनमें से कुछ यात्रियों के द्वारा बहुमूल्य यात्रावृतांतों की भी रचना की गई हैंl इन यात्रावृतांतों से हमें तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति को समझने में मदद मिलती हैl

अबू अब्दुल्लाह/इब्नेबतूता : वह मोरक्को का रहने वाला थाl उसने अपने जीवन के तीस साल उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी अफ्रीका, दक्षिणी यूरोप, पूर्वी यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप, मध्य एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वी चीन की यात्रा में बिताए थे. उसने अपनी किताब “रेहला” (तुहफाट-उल-नज़र फी गरीब उल-अम्सर वा अजीब-उल-असर) में “हरिहर प्रथम” के शासनकाल का वर्णन किया हैl

मेगस्थनीज (304-299 ई.पू.): मेगस्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी सम्राट सेल्यूकस के राजदूत के रूप में आया था।

इसने मौर्य कालीन भारत  के बारे में अपने अनुभवों एवं विचारों को अपनी पुस्तक इण्डिकामें लेखबद्ध किया है।यद्यपि मूल पुस्तक तो अप्राप्य है किन्तु परवर्ती लेखकों-एरियन,स्ट्रैबो,प्लिनी आदि की रचनाओं में उसकी पुस्तक के कुछ अंश उद्धृत किये गये हैं। मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय समाज में सातवर्ग थे।उसने दास प्रथा का उल्लेख नहीं किया है।किन्तु सती प्रथा का उल्लेख किया है। उसके अनुसार भारतीय यूनानी देवता डायोनीसियस तथा हेराक्लीज की पूजा करते थे। वस्तुतः इससे शिव एवं कृष्ण की पूजा से तात्पर्य है। उसने लिखा है कि भारत में दुर्भिक्ष नहीं पङते थे। उसके अनुसार मौर्य काल में नगर का प्रबंध एक नगर परिषद द्वारा होता था जिसमें पाँच-2 सदस्यों वाली छः समितियाँ काम करती थी। इसने भारतीय पत्तनों, बंदरगाहों तथा व्यापारिक माल का वर्णन किया गया है। यह संगम युग का महत्वपूर्ण विदेशी साहित्यिक स्रोत है। इंडिका में दक्षिणी भारत के पत्तनों एवं प्रथम शदाब्दी ई. में रोमन साम्राज्य के साथ  होने वाले व्यापार का विस्तृत वर्णन मिलता है।

प्लिनी(प्रथम शता.):  यह यूनानी लेखक था।इन्होंने लैटिन भाषा में नेचुरल हिस्ट्री लिखी जो इण्डिका पर आधारित है। इसने अपनी पुस्तक नेचुरल हिस्ट्री में प्रतिवर्ष रोम से भारत में चली जाने वाली सोने की भारी मात्रा के लिए दुख प्रकट किया है। प्लिनी ने भारतीय बहुमूल्य रत्नों की एक लंबी सूची दी है और भारत को एक बहुमूल्य रत्नों वाला एक बङा उत्पादक देश बताया है। उसने भारत तथा उसकी नदियां को रत्न धारक उपाधि से विभूषित किया है।

स्ट्रैबो: यह एक यूनानी लेखक था जो दूसरी शता. में भारत आया था।इसके अनुसार मौर्यकाल में नावों के निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था।उसने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी हस्तशिल्पी के हाथ या आंख को क्षति पहुंचाता था तो उसे मृत्युदंड दिया जाता था। उसने पश्चिमी व्यापार में भारतीय भागीदारी से संबंधित रोचक संस्मरणों का वर्णन किया है।

फाह्यान(399-414ई.): प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षुक फाह्यान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भारत आया था।इसने तत्कालीन भारत की सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी दी है।(राजनीतिक स्थिति का वर्णन नहीं )। फाह्यान के अनुसार गुप्तकाल में वस्तु विनिमयकौङियों के माध्यम से होता था।उसने चंद्रगुप्त मौर्य के राजप्रसाद का वर्णन करते हुए  लिखा है कि यह राजप्रसाद मानव कृति नहीं बल्कि देव निर्मित है।

ह्वेनसांग ( 9629-643ई.):  प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षुक ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन के शासन काल में भारत आया।तीर्थयात्रियों के राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध इस चीनी बौद्ध भिक्षुक ने कई वर्ष भारत में रहकर नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया

इसने हर्ष को शिलादित्य के नाम से अभिहित किया है।

इसके यात्रा विवरण को सि-यू-की कहा जाता है।कन्नौज की धर्म सभा का यह अध्यक्ष था।ह्मेनसांग ने क्षत्रियों की वीरता की प्रशंसा की तथा उन्हें राजाओं की जाति का तथा शूद्रों को कृषक कहा है।

अलबरूनी(1024-1030ई.): भारत आने वाले प्रमुख अरब यात्रियों में अलबरूनी उर्फ अबूरेहान भी था।यह महमूद गजनबी के सोमनाथ पर आक्रमण के समय भारत आया था।यहाँ रहते हुए इसने खगोल विद्या, संस्कृत तथा रसायन शास्र आदि विषयों का विस्तृत विवरण किया है।

अलबरूनी की पुस्तक तहकीक-ए-हिन्दग्यारहवीं शता. के भारत का चित्र प्रस्तुत करती है।उसके अनुसार ब्राह्मणों को मृत्युदंड से छूट थी। ब्राह्मणों के लिए सबसे कठोर दंड देश निष्कासन था। उसके अनुसार किसी ब्राह्मण के विरुद्ध किये गये घातक अपराध से किसी भी प्रकार की मुक्ति नहीं पायी जा सकती है, किसी ब्राह्मण की हत्या करना महानतम अपराध था जिसे व्रज हत्याकहा जाता था।

अलबरूनी ने चार परंपरागत जातियों का उल्लेख किया है। इन जातियों से बाहर के लोग अत्यंज कहलाते हैं। उसने अछूतों की सबसे लंबी सूची दी है। अलबरूनी ने तत्कालीन समाज में वैश्यों एवं शूद्रों में कोई अंतर नहीं पाया है यदि इनमें से किसी भी जाति के लोग वेदों का पाठ करते  तो राजा उसकी जीभ कटवा देता था

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